पेरिस का 850 साल पुराना मशहूर नॉट्र डाम कैथेड्रल सोमवार को आग की चपेट में आकर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया.
जहां एक तरफ आग लगने के कारणों को तलाशा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ इस पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि आस्था के इस केंद्र की मरम्मत कैसे की जा सकती है.
कई कंपनियों और उद्योगपतियों ने इसके पुनर्निर्माण पर आगे आए हैं, अब तक सैकड़ों मिलियन यूरो इकट्ठा भी हो गए हैं.
1984 में बिजली गिरने से लगी आग में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए इंग्लैंड के यॉर्क मिनिस्टर कैथेड्रल के पुनर्निर्माण में काम करने वाले जॉन डेविड नॉट्र डाम कैथेड्रल की मरम्मत को लेकर बात करने के लिए सबसे उपयुक्त लोगों में से हैं.
वो कहते हैं, "जब हम भीतर गए तो हमें वहां जली हुई लकड़ियों के ढेर, राख और कालिख जमी दिखी. पूरी इमारत धू-धू कर जल रही थी. तब भी पूरी टीम को इस बात को लेकर विश्वास था कि हम उसकी मरम्मत कर सकते हैं और आज भी वो नॉट्र डाम के लिए ठीक वैसा ही सकारात्मक नज़रिया रखते हैं."
डेविड कहते हैं, "यह दिखाने का अवसर है कि यह काम आज भी किया जा सकता है."
वो कहते हैं कि मरम्मत करने से पहले टीम को इस चर्च के बाहर के मचान को हटाना होगा. जब आग लगी थी तब यहां व्यापक रूप से मरम्मत का काम पहले से चल रहा था. ऐसे में इसके बाहरी हिस्से को एक काफी बड़े मंचनुमा ढांचे ने कवर कर रखा था.
वो कहते हैं कि हवा और बारिश से बचाने के लिए चर्च के ऊपरी हिस्से को भी कवर किया जाना होगा.
डेविड कहते हैं, "चर्च के अंदर गिरी हुई लकड़ी और अन्य मलबे को साफ़ करना होगा."
यूनिवर्सिटी ऑफ़ यॉर्क के पुरातत्व विभाग के डॉ. केट जाइल्स कहती हैं, "किसी भी लकड़ी, पत्थर और कलाकृतियों के बचे हुए टुकड़ों को हटाने से पहले उनकी पुरातात्विक रिकॉर्डिंग करनी होगी."
वो कहती हैं, "इससे नॉट्र डाम टीम को पहले से इमारत में लगी चीज़ों की डिजाइन को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी."
विशेषज्ञों का कहना है कि कैथेड्रल के साफ़ हो जाने के बाद इसका सर्वे करना ज़रूरी होगा ताकि हुई क्षति को मापा जा सके और यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें प्रवेश करना अब सुरक्षित है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिंकन में प्राध्यापक डॉ. अमीरा एल्नोकलि कहते हैं, "सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण विषय है, ढहने या मलबा गिरने के किसी भी जोखिम से बचने के लिए बहुत अच्छे से मुआयना किया जाना चाहिए.
इसके बाद चर्च की छत पर नक्काशी के काम का सर्वे किया जाएगा.
केम्बिज यूनिवर्सिटी के मध्यकालीन कला विभाग में प्रोफ़ेसर पॉल बिंस्की कहते हैं, "ऊपरी नक्काशी, मेहराब, और दरीचा (खिड़की) काफी गरम हो गए होंगे और अधिक तापमान ने यहां लगे पत्थरों को कमजोर कर दिया होगा.
वो कहते हैं, "सबसे पहले पत्थर का सर्वे करना होगा. पूरी इमारत के चारों तरफ मचान बनाना पड़ेगा और बहुत बारीकी से पूरी स्थिति पर नज़र बनाए रखना पड़ेगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा इसलिए कि जब लकड़ी से बनी ऊपरी छत आग से नष्ट होती है तो पत्थर से बने भीतरी छत पर आग का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है."
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा इसलिए क्योंकि पत्थर की छत गिरने का सबसे अधिक असर तब होगा, जब लकड़ी की छत टूट गई होगी.
19वीं सदी की मीनार पर बनी छत यदि पत्थर के बने मेहराब पर गिरी होंगी, जो 108 फ़ीट की ऊंचाई पर हैं, तो क्या होगा.
"मेहराब होने की वजह से ऊपर लगी आग से चर्च की बाकी कई चीज़ें नुकसान होने से बच गई होंगी, निश्चित ही, इसने कई चीज़ों को बचाने में अहम किरदार निभाया होगा."
जो तस्वीरें आ रही हैं उनसे यह लगता है कि मंच, बैठने की जगहें और वो टेबल जिस पर यीशु को चढ़ाने की चीज़ें रखी जाती हैं काफी हद तक बच गई हैं.
कैथेड्रल के अंदर की तस्वीर दिखाती हैं कि कम-से-कम इसके गुंबद में लगी प्रसिद्ध गोलकार खिड़की बच गई है, हालांकि कुछ अन्य शीशे की खिड़कियों को लेकर चिंताएं बरकार हैं.
शीशे की खिड़कियों की विशेषज्ञ सारा ब्राउन कहती हैं, "शुरू में एक सर्वे किया जाएगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि ऐतिहासिक और कलात्मक रूप से प्राथमिकताएं क्या हैं."
वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि खिड़कियों पर खास ध्यान देने की आवश्यकता होगी जैसी आग लगी थी उससे बहुत ऊंचा धुंआ उठा था. यदि खिड़कियां ठीक होती हैं तो भी निश्चित रूप से उनकी सफ़ाई करनी होगी."
ब्राउन कहती हैं, "आग की वजह से गर्म और फिर तेज़ी से ठंडे हुए शीशों को पानी की धार से साफ़ करना सहसे बड़ी समस्या होगी."
कितना नुक़सान हुआ है इसे जानने के लिए विशेषज्ञों को अभी तक साइट पर जाने की अनुमति नहीं दी गई है. हालांकि अग्निशमन कर्मचारी नुकसान का अंदाज़ा लाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.
Wednesday, April 17, 2019
Wednesday, April 10, 2019
ड्रीम11 एक अरब डॉलर के वैल्यूएशन वाली देश की पहली गेमिंग कंपनी बनी
मुंबई. ऑनलाइन गेमिंग फर्म ड्रीम11 देश की पहली गेमिंग यूनिकॉर्न बन गई है। यूनिकॉर्न उन कंपनियों को कहा जाता है जिनकी वैल्यू कम से कम 1 अरब डॉलर (7,000 करोड़ रुपए) हो। हेज फंड स्टीडव्यू कैपिटल से दूसरे राउंड का निवेश मिलने के बाद ड्रीम11 का वैल्यूएशन इससे ज्यादा हो गया है। कंपनी ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
महेंद्र सिंह धोनी हैं ड्रीम11 के ब्रांड एंबेसडर
ड्रीम11 के यूजर अलग-अलग खेलों के लिए अपनी टीमें बनाकर ऑनलाइन गेम खेल सकते हैं। इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल और नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन जैसे खेल संगठनों के साथ ड्रीम11 की पार्टनरशिप है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के फैंटेसी स्पोर्ट्स मार्केट में ड्रीम11 का 90% शेयर है। महेंद्र सिंह धोनी ड्रीम11 के ब्रांड एंबेसडर हैं।
इस साल के आखिर तक यूजर संख्या 10 करोड़ पहुंचने की उम्मीद
ड्रीम11 के निवेशकों में चीन की मल्टीनेशनल इन्वेस्टमेंट फर्म टेनसेंट होल्डिंग्स भी शामिल है। ड्रीम11 के 5 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं। इस साल के आखिर तक कंपनी को यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। 2008 में हर्ष जैन और भावित सेठ ने इसकी शुरूआत की थी।
पिछले साल अप्रैल की एक रिपोर्ट के मुताबिक ड्रीम11 को कानूनी उलझनों का सामना भी करना पड़ा था। फैन्टेसी (काल्पनिक) गेमिंग को जुए की तरह मानते हुए ड्रीम11 को कोर्ट में चुनौती दी गई थी। लेकिन, कोर्ट ने कहा कि इसमें चांस नहीं बल्कि स्किल शामिल है।
इन 91 सीटों पर पिछले दो चुनावों की स्थिति
2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन 91 में से 7 और कांग्रेस ने 55 सीटें जीती थीं। 2014 में यह तस्वीर बदल गई। कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा को 25 सीटों का फायदा हुआ और वह 32 के आंकड़े तक पहुंच गई। पहले चरण की इन 91 सीटों पर पिछली बार कांग्रेस से ज्यादा सफल तेदेपा (16) और टीआरएस (11) रही थी।
मोदी ने देर से प्रचार शुरू किया, राहुल ने उनसे 9 रैलियां ज्यादा कीं
लोकसभा चुनाव की घोषणा 10 मार्च को हुई थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अगले दिन यानी 11 मार्च से ही प्रचार शुरू कर दिया था। उन्होंने कांग्रेस के ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच पहली रैली की थी। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा के 10 दिन बाद 20 मार्च से प्रचार शुरू किया था। तब उन्होंने ‘मैं भी चौकीदार’ कैम्पेन की लॉन्चिंग के बाद देशभर में 25 लाख सिक्युरिटी गार्ड्स को ऑडियो-वीडियो के जरिए संबोधित किया था। 9 अप्रैल तक मोदी ने 30 रैलियां कीं। वहीं, राहुल ने 39 रैलियों को संबोधित किया।
महेंद्र सिंह धोनी हैं ड्रीम11 के ब्रांड एंबेसडर
ड्रीम11 के यूजर अलग-अलग खेलों के लिए अपनी टीमें बनाकर ऑनलाइन गेम खेल सकते हैं। इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल और नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन जैसे खेल संगठनों के साथ ड्रीम11 की पार्टनरशिप है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के फैंटेसी स्पोर्ट्स मार्केट में ड्रीम11 का 90% शेयर है। महेंद्र सिंह धोनी ड्रीम11 के ब्रांड एंबेसडर हैं।
इस साल के आखिर तक यूजर संख्या 10 करोड़ पहुंचने की उम्मीद
ड्रीम11 के निवेशकों में चीन की मल्टीनेशनल इन्वेस्टमेंट फर्म टेनसेंट होल्डिंग्स भी शामिल है। ड्रीम11 के 5 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं। इस साल के आखिर तक कंपनी को यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। 2008 में हर्ष जैन और भावित सेठ ने इसकी शुरूआत की थी।
पिछले साल अप्रैल की एक रिपोर्ट के मुताबिक ड्रीम11 को कानूनी उलझनों का सामना भी करना पड़ा था। फैन्टेसी (काल्पनिक) गेमिंग को जुए की तरह मानते हुए ड्रीम11 को कोर्ट में चुनौती दी गई थी। लेकिन, कोर्ट ने कहा कि इसमें चांस नहीं बल्कि स्किल शामिल है।
इन 91 सीटों पर पिछले दो चुनावों की स्थिति
2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन 91 में से 7 और कांग्रेस ने 55 सीटें जीती थीं। 2014 में यह तस्वीर बदल गई। कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा को 25 सीटों का फायदा हुआ और वह 32 के आंकड़े तक पहुंच गई। पहले चरण की इन 91 सीटों पर पिछली बार कांग्रेस से ज्यादा सफल तेदेपा (16) और टीआरएस (11) रही थी।
मोदी ने देर से प्रचार शुरू किया, राहुल ने उनसे 9 रैलियां ज्यादा कीं
लोकसभा चुनाव की घोषणा 10 मार्च को हुई थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अगले दिन यानी 11 मार्च से ही प्रचार शुरू कर दिया था। उन्होंने कांग्रेस के ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच पहली रैली की थी। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा के 10 दिन बाद 20 मार्च से प्रचार शुरू किया था। तब उन्होंने ‘मैं भी चौकीदार’ कैम्पेन की लॉन्चिंग के बाद देशभर में 25 लाख सिक्युरिटी गार्ड्स को ऑडियो-वीडियो के जरिए संबोधित किया था। 9 अप्रैल तक मोदी ने 30 रैलियां कीं। वहीं, राहुल ने 39 रैलियों को संबोधित किया।
Monday, April 1, 2019
क्या दलितों के बीच चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से मायावती परेशान हैं?
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती का भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर को बीजेपी का एजेंट बताना और फिर चंद्रशेखर का मायावती पर पलटवार करना एक नई राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है.
राजनीतिक जगत में इसे दो तरीक़े से देखा जा रहा है- दलितों के बीच चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से मायावती का परेशान होना और चंद्रशेखर का समय से पहले बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल लेना.
भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर दो साल पहले उस वक़्त चर्चा में आए थे जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा हुई थी. उस समय उनका संगठन भीम आर्मी और उसका स्लोगन 'द ग्रेट चमार' भी ख़बरों में छाया रहा.
हिंसा के आरोप में चंद्रशेखर समेत भीम आर्मी के कई सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया था और उस वक़्त ये मामला भी काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने दलितों के साथ हुई हिंसा पर संवेदना जताने में काफ़ी देर की. बहुजन समाज पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ कोई आंदोलन भी नहीं किया.
मायावती शब्बीरपुर गईं ज़रूर लेकिन हिंसा के कई दिन बाद. उस समय भी उन्होंने दलित समुदाय को भीम आर्मी जैसे संगठनों से सावधान रहने की हिदायत दी थी. मायावती ने उस वक़्त भी भीम आर्मी और चंद्रशेखर को बीजेपी का 'प्रॉडक्ट' बताया था.
उसके बाद चंद्रशेखर जब कभी भी सुर्खियों में रहे, मायावती ने या तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और दी भी तो चंद्रशेखर को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर. हालांकि जेल से छूटकर आने के बाद चंद्रशेखर ने सीधे तौर पर कहा था कि वो बहुजन समाज पार्टी और उसकी नेता मायावती के समर्थन में हैं और उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं.
भीम आर्मी ख़ुद को एक सामाजिक संगठन के तौर पर पेश करता है और उसके प्रमुख चंद्रशेखर कई बार ख़ुद कह चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का अभी कोई मक़सद नहीं है.
लेकिन वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की उनकी घोषणा से ये तो साफ़ हो गया कि भीम आर्मी एक राजनीतिक दल में अभी भले न तब्दील हो लेकिन चंद्रशेखर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता.
जानकारों के मुताबिक़, चंद्रशेखर के राजनीति में आने से सबसे ज़्यादा ख़तरा बहुजन समाज पार्टी को दिखता रहा है क्योंकि जिस दलित समुदाय को बीएसपी अपना मज़बूत वोट बैंक मानती है, चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी भी उसी समुदाय के हित में काम करते हैं.
चंद्रशेखर की वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा ने बीएसपी नेता मायावती को हैरान कर दिया और उन्होंने तत्काल बयान जारी करके चंद्रशेखर पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप मढ़ दिया.
हालांकि चंद्रशेखर ने भी ट्वीट के ज़रिए मायावती के बयान को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है लेकिन जानकारों का मानना है कि मायावती ने इस मामले में जल्दबाज़ी कर दी है.
वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी कहते हैं, "मायावती ने बहुत ही जल्दबाज़ी में और बहुत बड़ा आरोप चंद्रशेखर पर लगा दिया है. सहारनपुर और उसके आस-पास के इलाक़ों में दलित समाज में उसका संगठन जिस तरह से काम कर रहा है और समाज के बीच उसका जितना असर है, उसे देखते हुए उसके प्रभाव को नकारना भूल होगी."
हालांकि रियाज़ हाशमी ये भी कहते हैं कि चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी का प्रभाव राजनीति और चुनावी परिणामों में कितना दिखता है, इसका आज तक परीक्षण तो नहीं हुआ, लेकिन प्रभाव पड़ना ज़रूर चाहिए.
उनके मुताबिक, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दलित समुदाय अच्छी तरह जानता है कि बहुजन समाज पार्टी एक राजनीतिक पार्टी है और उसकी सोच में राजनीतिक लाभ सबसे पहले रहेगा. दलितों के लिए ज़मीन पर संघर्ष भीम आर्मी पिछले दो-तीन साल से जिस तरह कर रही है, उससे उनके बीच उसकी पैठ काफ़ी गहरे तक बढ़ी है. इस स्तर तक कि यदि मायावती भी उसके बारे में कुछ ग़लत कहें तो शायद लोग यक़ीन न करें."
दरअसल, मायावती और चंद्रशेखर दोनों का प्रभाव क्षेत्र सहारनपुर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर कई बार बीएसपी और मायावती के समर्थन की बात करके बहुजन एकता का संदेश देने की कोशिश करते हैं लेकिन मायावती उनकी इस हमदर्दी को भी आशंका भरी निग़ाह से ही देखती रही हैं. रविवार को उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी चंद्रशेखर को एक ख़ास रणनीति के तहत उनकी पार्टी में भेजना चाहती थी.
राजनीतिक जगत में इसे दो तरीक़े से देखा जा रहा है- दलितों के बीच चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से मायावती का परेशान होना और चंद्रशेखर का समय से पहले बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल लेना.
भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर दो साल पहले उस वक़्त चर्चा में आए थे जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा हुई थी. उस समय उनका संगठन भीम आर्मी और उसका स्लोगन 'द ग्रेट चमार' भी ख़बरों में छाया रहा.
हिंसा के आरोप में चंद्रशेखर समेत भीम आर्मी के कई सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया था और उस वक़्त ये मामला भी काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने दलितों के साथ हुई हिंसा पर संवेदना जताने में काफ़ी देर की. बहुजन समाज पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ कोई आंदोलन भी नहीं किया.
मायावती शब्बीरपुर गईं ज़रूर लेकिन हिंसा के कई दिन बाद. उस समय भी उन्होंने दलित समुदाय को भीम आर्मी जैसे संगठनों से सावधान रहने की हिदायत दी थी. मायावती ने उस वक़्त भी भीम आर्मी और चंद्रशेखर को बीजेपी का 'प्रॉडक्ट' बताया था.
उसके बाद चंद्रशेखर जब कभी भी सुर्खियों में रहे, मायावती ने या तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और दी भी तो चंद्रशेखर को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर. हालांकि जेल से छूटकर आने के बाद चंद्रशेखर ने सीधे तौर पर कहा था कि वो बहुजन समाज पार्टी और उसकी नेता मायावती के समर्थन में हैं और उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं.
भीम आर्मी ख़ुद को एक सामाजिक संगठन के तौर पर पेश करता है और उसके प्रमुख चंद्रशेखर कई बार ख़ुद कह चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का अभी कोई मक़सद नहीं है.
लेकिन वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की उनकी घोषणा से ये तो साफ़ हो गया कि भीम आर्मी एक राजनीतिक दल में अभी भले न तब्दील हो लेकिन चंद्रशेखर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता.
जानकारों के मुताबिक़, चंद्रशेखर के राजनीति में आने से सबसे ज़्यादा ख़तरा बहुजन समाज पार्टी को दिखता रहा है क्योंकि जिस दलित समुदाय को बीएसपी अपना मज़बूत वोट बैंक मानती है, चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी भी उसी समुदाय के हित में काम करते हैं.
चंद्रशेखर की वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा ने बीएसपी नेता मायावती को हैरान कर दिया और उन्होंने तत्काल बयान जारी करके चंद्रशेखर पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप मढ़ दिया.
हालांकि चंद्रशेखर ने भी ट्वीट के ज़रिए मायावती के बयान को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है लेकिन जानकारों का मानना है कि मायावती ने इस मामले में जल्दबाज़ी कर दी है.
वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी कहते हैं, "मायावती ने बहुत ही जल्दबाज़ी में और बहुत बड़ा आरोप चंद्रशेखर पर लगा दिया है. सहारनपुर और उसके आस-पास के इलाक़ों में दलित समाज में उसका संगठन जिस तरह से काम कर रहा है और समाज के बीच उसका जितना असर है, उसे देखते हुए उसके प्रभाव को नकारना भूल होगी."
हालांकि रियाज़ हाशमी ये भी कहते हैं कि चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी का प्रभाव राजनीति और चुनावी परिणामों में कितना दिखता है, इसका आज तक परीक्षण तो नहीं हुआ, लेकिन प्रभाव पड़ना ज़रूर चाहिए.
उनके मुताबिक, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दलित समुदाय अच्छी तरह जानता है कि बहुजन समाज पार्टी एक राजनीतिक पार्टी है और उसकी सोच में राजनीतिक लाभ सबसे पहले रहेगा. दलितों के लिए ज़मीन पर संघर्ष भीम आर्मी पिछले दो-तीन साल से जिस तरह कर रही है, उससे उनके बीच उसकी पैठ काफ़ी गहरे तक बढ़ी है. इस स्तर तक कि यदि मायावती भी उसके बारे में कुछ ग़लत कहें तो शायद लोग यक़ीन न करें."
दरअसल, मायावती और चंद्रशेखर दोनों का प्रभाव क्षेत्र सहारनपुर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर कई बार बीएसपी और मायावती के समर्थन की बात करके बहुजन एकता का संदेश देने की कोशिश करते हैं लेकिन मायावती उनकी इस हमदर्दी को भी आशंका भरी निग़ाह से ही देखती रही हैं. रविवार को उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी चंद्रशेखर को एक ख़ास रणनीति के तहत उनकी पार्टी में भेजना चाहती थी.
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